मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानी ‘कानीबाट’ में आंचलिकता
कु. वर्षा अग्रवाल1, मधुलता बारा2’
1शोध-छात्रा, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छŸाीसगढ़)
2वरि. सहा. प्राध्यापक, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छŸाीसगढ़)
सारांश
किसी भी राष्ट्र का वह भाग या कोना जहाँ पर निवास करने वाली जनता एक-दूसरे से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक रूप से संबद्ध हो तथा अपनी संस्कृति को सहेजने के प्रति कटिबद्ध हो, उस स्थान विशेष को अंचल की श्रेणी में रखा जाता है। आदिवासियों के बीच रहकर उनके जीवन के सुख-दुख को, उनके संघर्ष तथा उनकी सहजता को इन्होंने बड़े ही नजदीक से निहारा है। आदिवासी अंचल की कुछ परंपराओं को जोड़कर लेखिका ने कहानी में सोने में सुहागा का कार्य किया है। प्रस्तुत कहानी ‘कानीबाट’ स्वाभाविक रूप से आंचलिक कहानी कही जा सकती है।
प्रस्तावना
किसी भी राष्ट्र का वह भाग या कोना जहाँ पर निवास करने वाली जनता एक-दूसरे से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक रूप से संबद्ध हो तथा अपनी संस्कृति को सहेजने के प्रति कटिबद्ध हो, उस स्थान विशेष को अंचल की श्रेणी में रखा जाता है। एक अंचल की विशेषता यह है कि उसका रहन-सहन, प्रथाएँ, आस्था, मान्यता तथा मनोवैज्ञानिक स्तर एक-दूसरे से समान किंतु किसी अन्य अंचल से भिन्न होता है और यही वह गुण है जो उसे दूसरे अंचल से पृथक करता है। अंचल शब्द का अर्थ हिंदी शब्दकोश के अनुसार- ‘‘देश या प्रांत का एक भाग, क्षेत्र, नदी का किनारा, पल्लू, आंचल।’’1 ‘अंचल’ मूलतः संस्कृत का शब्द है। ‘अंचल’ शब्द से ही ‘आंचलिकता’ बना है।
हिंदी साहित्य में फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ ने अपने उपन्यास ‘मैला आंचल’ (1954) में प्रथम बार अंचल शब्द का प्रयोग कुछ इस प्रकार किया कि साहित्य में आंचलिकता पर विचार किया जाने लगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि साहित्य में आंचलिकता शब्द का आरंभ 1953-1954 के आस-पास से होने लगा है। धीरे-धीरे साहित्य की इस प्रवृŸिा ने वाद का रूप ले लिया और ‘आंचलिकतावाद’ कहलाने लगा। कुछ प्रबुद्ध-जनों द्वारा इसे ‘क्षेत्रियतावाद’, ‘स्थानीयतावाद’ आदि जैसे अलगाववादी प्रवृŸिा से जोड़ा गया, किंतु ‘आंचलिकतावाद’ राष्ट्र को, विविधताओं के मध्य एक करने की प्रवृŸिा है न कि जाति, क्षेत्र, स्थान के नाम पर पृथक करने की सांप्रदायिक भावना है। ‘आंचलिकता’ की परिभाषा देते हुए राजेन्द्र अवस्थी कहते हैं- ‘‘आंचलिकता क्या है ? अंचल का सीधा-सादा अर्थ है ‘जनपद’ या ‘क्षेत्र’। जिस कथाकृति में किसी विशिष्ट जनपद या क्षेत्र के जन-जीवन का समग्र चित्रण वहाँ की भाषा, वेशभूषा, धर्म, जीवन, समाज, संस्कृति और आर्थिक तथा राजनैतिक जागरण के प्रश्न एक साथ उभर कर आएँ, वह आंचलिक कृति होगी।’’2 अतः यह कहा जा सकता है कि आंचलिक कृति में उस अंचल विशेष के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक प्रवृŸिा का वर्णन उसके मूल भावों तथा मनोवैज्ञानिक प्रवृŸिा के आधार पर किया जाता है।
स्वतंत्रता के पश्चात् तथा स्वतंत्रता से पूर्व भी आंचलिक साहित्य लिखे गए हैं। आंचलिक साहित्य की परंपरा में प्रेमचंद, यशपाल, नागार्जुन, फणीश्वर नाथ ‘रेणु’, रांगेय राघव, राही मासूम रज़ा आदि को रखा जाता है। साहित्य में महिला लेखिकाओं के आगमन से आंचलिक साहित्य और भी अधिक समृद्ध हुआ है। ‘मेहरुन्निसा परवेज़ इनमें से ही एक लेखिका हैं, जिन्होंने छŸाीसगढ़ के बस्तर अंचल का अपने कथा-साहित्य में चित्रण किया है। लेखिका का बचपन बस्तर के ही इन जंगलों, पहाड़ों तथा नदियों के आस-पास ही बीता है। आदिवासियों के बीच रहकर उनके जीवन के सुख-दुख को, उनके संघर्ष तथा उनकी सहजता को इन्होंने बड़े ही नजदीक से निहारा है। आदिवासी क्षेत्र के प्रति उनकी संवेदना तथा आत्मीयता उनके कथा-साहित्य में स्पष्ट रूप से झलकती है। उनकी ‘कानीबाट’ कहानी आदिवासी संस्कृति से ओत-प्रोत है। ‘कानीबाट’ अर्थात् ‘पगडंडी’ शीर्षक ही आदिवासी अंचल के प्रति लेखिका के प्रेम का प्रमाण है। प्रस्तुत कहानी ‘कोतरी नदी’ के किनारे बसे गाँव से संबंधित है। इस कहानी में लेखिका ने आदिवासी क्षेत्र की संस्कृति, संस्कार, सामाजिक जीवन, धार्मिक आस्था, आर्थिक परिस्थिति, उनकी विचारधारा आदि का चित्रण बड़ी ही तत्परता के साथ किया है।
आंचलिक चित्रण
मनुष्य जिस समाज की सदस्यता स्वीकार करता है, उस समाज के प्रति उसे अपने कर्Ÿाव्य का भी बोध होता है। समाज में ही मनुष्य पलता, बढ़ता और सीखता है। मेहरुन्निसा परवेज़ की कहानी ‘कानीबाट’ में हमें आदिवासियों के सामाजिक जीवन का, उनकी परंपराओं, खेल तथा संस्कृति का चित्रण देखने मिलता है। जन्म-संस्कार का चित्रण करते हुए मेहरुन्निसा परवेज़ ‘कानीबाट’ कहानी में नायिका दुलेसा की सहेली जोनी के बच्चे के जन्म-संस्कार का वर्णन करते हुए बताती है- ‘‘जोनी बच्चे को गोद में लेकर बाहर आई और औरतों के बीच बैठ गई। काको ने दीया जलाकर उसके सामने रख दिया और एक थाली में चावल रख गई। औरतें आती-जाती एक मुट्ठी चावल लेतीं और ऊपर हाथ करके चावल को बच्चे पर गिरा देती कि खूब लंबी आयु पाए और रुपया-आठ आना से बच्चे का टीका करतीं।’’3 इसी प्रकार बच्चे के नामकरण-संस्कार का भी उल्लेख प्रस्तुत कहानी में मिलता है। आदिवासियों में एक बहुत अच्छी विशेषता यह है कि ये लड़कियों के जन्म पर भी खुशी मनाते हैं, यह इस बात का प्रमाण है कि शहर की शिक्षित जनता तथा चकाचैंध से दूर शिक्षा के अभाव के बावजूद भी किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से पीड़ित नहीं हैं।
समाज एक ऐसी संस्था है, जिसे सुचारू रूप से चलाने हेतु विवाह संस्था बनाई गई। विवाह संस्कार स्त्री-पुरुष के पवित्र बंधन से बनता है, जिसमें ये दोनों मिलकर भावी जीवन का निर्माण करते हैं। विश्व की चाहे कोई भी संस्कृति हो, प्रत्येक संस्कृति में विवाह की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया है। ‘कानीबाट’ कहानी मेें आदिवासी अंचल में विवाह की परंपरा का वर्णन लेखिका ने बड़ी ही सुंदरता से किया है। जब दुलेसा बाहर देखती है- ‘‘फूलाँ के घर के सामने दो बल्लियाँ गड़ाकर सूअर को उल्टा लटका दिया गया था। यह इस बात का सूचक था कि फूलाँ के घर लड़के वाले आए हैं और भीतर बात चल रही है। जब बात तय हो जाएगी, तो सूअर को सीधा कर दिया जाएगा तथा शाम को इसी सूअर को काटकर सब लोग शराब के साथ खाकर आनंद मनाएँगे।’’4
महिलाओं को शृंगार, वस्त्राभूषण से बहुत अधिक प्रेम होता है, किसी भी जाति, धर्म, संस्कृति की स्त्री में यह समानता अवश्य होती है। ‘कानीबाट’ कहानी में नायिका दुलेसा के पारंपरिक शंृगार का अद्भूत वर्णन किया गया है। आदिवासी युवती द्वारा जिन-जिन आभूषणों का प्रयोग किया जाता है, उसका विस्तार से वर्णन किया गया है- ‘‘हर दिन की तरह आज भी उसने पूर्ण शृंगार कर रखा है। वह नाक में फुल्ली, गले मेें नीर, गुरिया तथा रुपया माला, ताबीज, कांच-मणि, कान में खिनवा, उंगली में रुपया अंगूठी, कांच की मोटी चूड़ियों के साथ बनुरिया तथा पैर में पैड़ी पहने थी। माथे पर तला कासराव, जूड़े में कतडांग (कौड़ी) रांग पनिया तथा मदार पोंगार (मंदार फूल) लगाए थी।’’5
आदिवासी संस्कृति बहुत सी परंपराओं को आज भी जीवित रखे हुए है। ये परंपराएँ उनके लिए धरोहर के समान है, जिनके इर्द-गिर्द इनका जीवन बसता है। इसके बिना आदिवासी संस्कृति के अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है। कहानी में ऐसी ही एक परंपरा का वर्णन देखने को मिलता है, वह है- ‘घोटुल-गृह’। ‘घोटुल-गृह’ एक प्रकार से वर्तमान शहरी भाषा में ‘क्लब’ का ही रूप है, जहाँ कुँवारे लड़के और लड़कियाँ रात्रि में उस गृह में एकत्र होकर नाच-गाना, तरह-तरह के खेल-खेलना तथा हँसी-मजाक करते हैं। इस घोटुल-गृह में खेले जाने वाले मुंदरी खेल का वर्णन करते हुए लेखिका बताती है- ‘‘सुंदरी खेल जो अक्सर चाँदनी रातों में खेला जाता है, वह आज खेला गया। सब घुटनों पर हाथ रखकर बैठ जाते हैं। कोई एक अंगूठी छिपा लेता है और लड़की चोर बनी, आँखों से टटोल-टटोल कर ढूँढ़ती है कि मुंदरी किसके पास है ? यह बड़ा ही उत्साही और प्रिय खेल माना जाता है।’’6
आदिवासी परंपराओं में घर जमाई रखना भी एक परंपरा शामिल है। इस कहानी के अंतर्गत नायिका दुलेसा के विवाह के लिए एक घर जमाई रखा जाता है। परंपरानुसार वह घर जमाई लड़की से बिना ब्याह किए उनके घर में एक साल तक रहकर उसके माता-पिता का पालन-पोषण करता है, उसके बाद ही माता-पिता अपनी लड़की उसे सौंपते हैं, किंतु इस कहानी के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि माता-पिता किसी विपरीत परिस्थिति के अतिरिक्त एक बार घर जमाई रख लेने पर उस लड़के से अपनी लड़की का विवाह अवश्य करते हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति में खान-पान का विशेष महत्व है, उत्सव के अनुसार नए-नए व्यंजन बनाना भी भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। स्थान, उपलब्धता तथा आवश्यकता के अनुरूप भी खान-पान की परंपरा का चलन है। लेखिका ने आदिवासियों के खान-पान की परंपरा का वर्णन भी इस कहानी में किया है, चूँकि ये जंगलों में निवास करते हैं, अतः इनका भोजन इन्हीं जंगलों से इन्हें प्राप्त होता है। जंगलोें से मिलने वाले ‘बोड़ा’ का वर्णन करती हुई लेखिका कहती हैं- ‘‘ओसारे में सरगी पŸाों से भरे टोकने रखे थे। सुबह मुँह अँधेरे माँ के साथ दुलेसा जंगल में पŸो लाने गई थी, वहीं से माँ ने धरती खोदकर बोड़ा निकाला था। कंवले-कंवले बोड़ा को देखकर दोनों प्रसन्न हो गए थे। जुलाई के प्रथम सप्ताह में ही ये मिलने शुरू हो जाते हैं। धरती जहाँ बोड़ा होता है, फट जाती है। वहीं थोड़ा-सा खोदने पर नन्हें-नन्हें आलू के आकार का बोड़ा निकलता है। जिस दिन जिसके घर बोड़ा साग बनता है, उस दिन घर के लोग उत्सुकता से खाना खाते हैं।’’7
आदिवासी अंचल में विभिन्न प्रकार की धार्मिक परंपराएँ हैं, अपने देवी-देवताओं को खुश करने हेतु मड़ई का आयोजन करते हैं। कहानी में नारायणपुर की मड़ई का वर्णन किया गया है। लेखिका ने बस्तर क्षेत्र के आंचलिक शब्दों का बड़ी ही सुंदरता से प्रयोग किया है- ‘‘कबडांग, संगो, जोन, महला, बांदरी, मांदरी, मिनसारे, कुमला, डोंगरी, रांग पनिया, पटका’’8 आदि आंचलिक शब्द स्थान-स्थान पर प्रयोग किया गया है।
निष्कर्ष
अंततः मेहरुन्निसा परवेज़ ने अपनी कहानी ‘कानीबाट’ में आंचलिकता का कोना-कोना बसाया हुआ है। इस एक कहानी में हमें बस्तर की संपूर्ण झलक स्पष्ट रूप से देखने मिलती है। लेखिका ने कहानी के माध्यम से आदिवासी संस्कृति का दर्शन कराने का प्रयत्न किया है। कहानी की गति और स्थान-स्थान पर आने वाली अंचल की विशेषता इस प्रकार गूँथी हुई मालूम पड़ती है कि कहीं से भी कहानी में काल्पनिकता का समावेश नहीं लगता, बल्कि ऐसा लगता है कि मानो लेखिका ने ही इस कहानी के पात्रों को स्वयं जीया है। पात्रों के नाम, उनके संवाद और वातावरण के अनुरूप उनके क्रियाकलाप पाठक के मन को सुकून देते हैं। गाँव के वातावरण को लेखिका ने बखूबी साकार किया है। आदिवासी अंचल की कुछ परंपराओं को जोड़कर लेखिका ने कहानी में सोने में सुहागा का कार्य किया है। कहानी को जबरदस्ती आंचलिक बनाने हेतु कोई भी संवाद, वातावरण अथवा पात्र ठूँसे हुए से नहीं लगते, बल्कि प्रस्तुत कहानी ‘कानीबाट’ स्वाभाविक रूप से आंचलिक कहानी कही जा सकती है।
संदर्भ-सूची
1. बाहरी, हरदेव. हिंदी शब्दकोश. दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, संस्करण 2012, पृ. 3.
2. सिन्हा, विद्या. आधुनिक परिदृश्य: आंचलिकता और हिंदी उपन्यास. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, संस्करण प्रथम 2001, पृ. 22.
3. परवेज, मेहरुन्निसा. फालगुनी. दिल्ली: पराग प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1978, पृ. 76.
4. वही, पृ. 84.
5. वही, पृ. 72.
6. वही, पृ. 81.
7. वही, पृ. 68.
8. वही, पृ. 67-87.
Received on 28.07.2014 Modified on 14.08.2014
Accepted on 21.08.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(3): July- Sept. 2014; Page 186-188